उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस हफ्ते हुए अमर उजाला संवाद के मंच से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान इस सुर्खियों में रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सड़कों पर नमाज न पढ़ने देनी की चेतावनी दी। इसका जवाब संवाद के ही मंच से अखिलेश यादव ने भी दिया। उन्होंने कहा कि अगर जगह कम है, कोई सड़क पर नमाज पढ़ भी रहा है तो क्या दिक्कत है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी विषय पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल, अनुराग वर्मा और संजय राणा मौजूद रहे।

अनुराग वर्मा: उत्तर प्रदेश में अब चुनाव की तैयारियां आधिकारिक रूप से शुरू हो गई हैं। सारे राजनीतिक दलों के ये समझ आ गया है कि सिर्फ मुस्लिम वोट से ही सरकार नहीं बनाई जा सकती है। तुष्टिकरण की राजनीति में कितना दम बचा है ये 2027 के विधानसभा चुनाव में सामने आ जाएगा।
राकेश शुक्ल: विकास की बात आप करेंगे तो सड़क पर नमाज नहीं पढ़ाना भी विकास है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में भी कहा गया है कि नमाज सार्वजनिक स्थान पर नहीं हो सकती है। मुस्लिम वोट अपने परंपरागत पार्टियों से खिसका है। इसलिए अखिलेश को भी इसकी चिंता है। 2014 के बाद वोटिंग का पैटर्न भी बदला है। ये बदला हुआ पैटर्न अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: योगी आदित्यनाथ एक ऐसा एंगल उछाल रहे हैं जो उनकी राजनीति को सूट करता है। इसी तरह अखिलेश भी उस वोट बैंक को एड्रेस करने की कोशिश कर रहे हैं जो उन्हें वोट करता है। दूसरा नमाज सड़कों पर पढ़ने की जहां तक बात है तो उसके लिए कानून है। कानून का पालन सबको करना चाहिए। अगर दोनों तरफ से इस कानून का पालन हो तो इसमें कुछ गलत नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही 2027 के चुनाव को देखते हुए दोनों पक्ष अपनी-अपनी तैयारियां कर रहे हैं।
संजय राणा: देश में धर्म के आधार पर तुष्टिकरण आजादी के बाद से ही चालू हो गया था। जहां तक योगी आदित्यनाथ की बात है तो उन्होंने कहा है कि सड़क पर नमाज नहीं, व्यवस्था बनाना सरकार का काम है। अगर सरकार उसे लागू कर रही है तो ये सही है। भारत रेलवे और आर्मी के बाद सबसे ज्यादा जमीने इनके पास हैं फिर भी सड़क पर नमाज क्यों पढ़नी है। अपनी विचारधारा को अपने तक रखना चाहिए। राजनीति एक वर्ग की नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक विकास और प्रशासन की होनी चाहिए।
रामकृपाल सिंह: हिंदू-मुस्लिम का बंटवारा बहुत पहले से है। पहले ये बहुत गहरा था। इसे पाटने की कोशिश की गई। इसी के चलते कभी मुस्लिम-दलित और ब्राह्मण कांग्रेस की कोर स्ट्रेंथ होती थी। 1992 के बाद मुस्लिम ने कांग्रेस को छोड़ गया और वो क्षेत्रीय दलों के साथ चला गया। कर्नाटक में हुए चुनाव में मुस्लिम एक बार फिर कांग्रेस के तरफ आया। तभी क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी बज गई थी। यही अखिलेश यादव की दिक्कत है। जहां तक योगी आदित्यनाथ की बात है तो उन्होंने जो कहा वो उनकी यूएसपी है।

