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पाकिस्तान का बड़ा कबूलनामा!:ईरानी विमान उसके एयरबेस पर मौजूद, अमेरिका ने मध्यस्थ की भूमिका पर उठाए सवाल – Pakistan Makes A Major Confession! Iranian Aircraft Are Present At Its Airbase

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अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में हालिया तनाव के दौरान पाकिस्तान की भूमिका अब खुद उसके लिए बड़ी कूटनीतिक मुश्किल बनती दिख रही है। पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार कर लिया है कि ईरानी विमान उसकी जमीन पर मौजूद हैं। हालांकि इस्लामाबाद ने इसे सीजफायर के दौरान आया सामान्य प्रशासनिक और लॉजिस्टिक सहयोग बताया, लेकिन इसी बयान ने उन आरोपों को और मजबूत कर दिया है कि पाकिस्तान ने ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय (MoFA) ने मंगलवार को जारी बयान में कहा कि पाकिस्तान में मौजूद ईरानी विमान युद्ध या किसी सैन्य कार्रवाई से जुड़े नहीं हैं। मंत्रालय ने दावा किया कि ये विमान युद्धविराम के दौरान आए थे और बातचीत प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों, सुरक्षा टीमों और प्रशासनिक कर्मचारियों की आवाजाही के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे।

बयान से खड़े हुए कई सवाल

लेकिन इसी बयान ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर ईरान के सैन्य विमान मौजूद हैं। इनमें ईरानी वायुसेना का RC-130 विमान भी शामिल बताया गया है, जो खुफिया जानकारी जुटाने और निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह लॉकहीड C-130 हरक्यूलिस विमान का विशेष सैन्य संस्करण माना जाता है।

अमेरिकी अधिकारियों ने क्या दावा किया?

अमेरिकी मीडिया नेटवर्क सीबीएस न्यूज ने दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान पाकिस्तान ने चुपचाप ईरानी विमानों को अपने एयरफील्ड इस्तेमाल करने दिए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका से अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता था, वहीं दूसरी ओर उसने ईरान को भी समर्थन दिया।

आलोचकों ने क्या लगाए आरोप?

रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल की शुरुआत में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा की थी, उसके कुछ दिनों बाद तेहरान ने कई विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस भेजे थे। पाकिस्तान ने इन्हें अस्थायी रूप से ठहराने की बात कही, लेकिन आलोचकों का कहना है कि सैन्य टोही विमानों की लंबी पार्किंग सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकती।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान वास्तव में ईरानी सैन्य संसाधनों को सुरक्षित ठिकाना दे रहा है, तो इससे उसकी तटस्थ मध्यस्थ वाली छवि कमजोर हुई है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस्लामाबाद पश्चिम एशिया के संघर्ष में अप्रत्यक्ष रूप से तेहरान के पक्ष में खड़ा नजर आ सकता है।

पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल?

इस पूरे मामले के बाद अमेरिका में भी पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम, जिन्हें ट्रंप का करीबी सहयोगी माना जाता है, ने पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका की “पूरी समीक्षा” करने की मांग की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि उन्हें पाकिस्तान के ऐसे कदम पर हैरानी नहीं होगी, क्योंकि इस्लामाबाद पहले भी इज़राइल को लेकर विवादित बयान दे चुका है।

पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर चिंता बढ़ी

वहीं CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी पाकिस्तान की विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रंप प्रशासन के कुछ अधिकारियों को शक है कि पाकिस्तान अमेरिका तक ईरान का पक्ष वास्तविकता से ज्यादा सकारात्मक तरीके से पहुंचा रहा था। कुछ अधिकारियों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान ने तेहरान के साथ बातचीत में अमेरिकी नाराजगी को सही तरीके से पेश नहीं किया।

बताया जा रहा है कि ईरान की ओर से अमेरिका को भेजा गया जवाब भी पाकिस्तान के माध्यम से वॉशिंगटन पहुंचाया गया था। इसी वजह से अब अमेरिकी प्रशासन के भीतर पाकिस्तान की दोहरी रणनीति को लेकर अविश्वास बढ़ गया है।

पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संबंध संतुलित रखने की कोशिश करता रहा है। लेकिन अब ईरानी सैन्य विमानों की मौजूदगी को लेकर सामने आई जानकारी ने उसकी कूटनीतिक संतुलन नीति को कठघरे में खड़ा कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह विवाद और बढ़ता है, तो पाकिस्तान को अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

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