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Bengal:अधीर की चौधराहट, हुमायूं की बाबरी और मुसलमानों की ममता; मुर्शिदाबाद की 22 सीटों पर बदले समीकरण – West Bengal Assembly Election Murshidabad Seats Power Equation Challenge Mamata Tmc Congress Humayun Kabir

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पश्चिम बंगाल की राजनीति का पावर सेंटर कहा जाने वाला मुर्शिदाबाद जिला इस बार बड़े उलटफेर का गवाह बनने जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में इस जिले ने एकतरफा ममता बनर्जी की झोली भर दी थी, लेकिन अब यहां समीकरणों की परतें उखड़ रही हैं। जिले की 22 सीटों पर इस बार मुकाबला बाहरी से ज्यादा अपनों की और साख की लड़ाई बन गया है। कहीं हार से उपजी सहानुभूति है, तो कहीं मजहबी वादों का नया ध्रुवीकरण।

यूसुफ की सेलिब्रिटी छवि का नुकसान

बहरामपुर की चुनावी फिजां में इस बार एक अलग तरह की कशमकश है। पांच बार के सांसद रहे कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी के लिए यह चुनाव महज एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी साख को वापस पाने का संघर्ष है। पिछले लोकसभा चुनाव में क्रिकेटर यूसुफ पठान ने उन्हें शिकस्त तो दे दी, लेकिन बहरामपुर के गलियारों में आज भी चौधराहट का अहसास अधीर के नाम से ही जुड़ा है। स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा आम है कि पठान एक विजिटिंग सेलिब्रिटी बनकर रह गए हैं, जबकि अधीर हार के बावजूद जनता के बीच डटे हैं। इस सीट पर वैसे तो अभी भाजपा का कब्जा है, मगर अधीर भी दम दिखाते नजर आते हैं। युसुफ पठान का बाहरी होना पूरे इलाके में तृणमूल को नुकसान पहुंचा रहा है। स्थानीय विधायकों के खिलाफ नाराजगी एक स्वाभाविक भाव है ही।

हुमायूं की बाबरी व बगावत का हेलीकॉप्टर

जिले की दूसरी सबसे चर्चित सीट रेजीनगर है। मुर्शिदाबाद जहां तृणमूल के बागी और निवर्तमान विधायक के साथ यहां की राजनीति के बैड बॉय कहे जाने वाले हुमायूं कबीर ने अपनी आम जनता उन्नयन पार्टी से खम ठोंक दिया है। इस सीट पर जो मजहबी कार्ड हुमायुं ने खेला है, उसकी खनक पूरे इलाके में दिखाई देती है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर कबीर ने बाबरी मस्जिद बनाने का एलान कर भावनाओं को हवा दे दी है। स्टिंग विवाद के बाद एआईएमआईएम सुप्रीमो असद्दुदीन ओवैसी ने भले ही गठबंधन तोड़ लिया हो, लेकिन हुमायूं खुद हेलीकॉप्टर से प्रचार कर रहे हैं। रेजीनगर और नोवादा जैसी सीटों पर उनकी मौजूदगी ने तृणमूल के कैडर वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाई है।

आंकड़ों का खेल- क्या लौटेगा 2016 का दौर

मुर्शिदाबाद का चुनावी इतिहास बेहद रोचक रहा है। 2016 में जब कांग्रेस और वामदल साथ थे, तब तृणमूल 22 में से मात्र 2 सीटें जीत पाई थी। वहीं, 2021 में सीतलकुची कांड के बाद अल्पसंख्यक वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण ने तृणमूल को 20 सीटें दिला दीं। सीतलकुची के एक बूथ पर सीआरपीएफ की गोली से एक मुस्लिम तृणमूल कार्यकर्ता की मौत के बाद अल्पसंख्यकों ने एकतरफा ममता को वोट कर कांग्रेस-लेफ्ट को जीरो कर दिया था। अब इस बार बोडवा, जलंगी, शमशेरगंज और रानीनगर जैसी सीटों पर मुकाबला फंस गया है। यदि मुस्लिम वोट रणनीतिक तरीके से नहीं बंटते हैं तो ममता को फायदा होगा, लेकिन यदि लोकसभा वाला रुख  यानी वोटों का बिखराव बरकरार रहा तो मुर्शिदाबाद की तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आएगी।

प्रायश्चित के मूड में मतदाता

मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग महसूस कर रहा है कि अधीर दादा के साथ अन्याय हुआ है। बहरामपुर की घरेलू महिलाएं अब खुलकर कह रही हैं कि दादा को जीतना चाहिए। स्थानीय उद्यमी आनंद सरकार, जिनका परिवार हमेशा ममता का मुरीद रहा, वह अब अधीर की ओर झुकाव दिखा रहे हैं। उन्हें लगता है कि क्षेत्र के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए अधीर जैसे कद्दावर नेता का सदन में होना जरूरी है। यह प्रायश्चित भाव एक घरेलू महिला प्रतिमा दास के शब्दों में समझा जा सकता है कि दादा को शत-प्रतिशत जिताएंगे। पिछली बार की गलती नहीं होगी।

वक्फ और मोहभंग का फैक्टर

मुर्शिदाबाद की सियासत का सबसे दिलचस्प पहलू मुस्लिम वोटों का बदलता मिजाज है। वक्फ कानून को लेकर ममता बनर्जी के एक यूटर्न से अल्पसंख्यक समाज का एक हिस्सा खुद को ठगा महसूस कर रहा है। फरक्का के ट्रांसपोर्ट कारोबारी शमसुल हक चौधरी का कहना है कि भाजपा शासित राज्यों से भी खराब हालत यहां के मुसलमानों की है।

यह बंगाल की राजनीति में एक दुर्लभ, लेकिन कड़ा संकेत है। इसे थोड़ा समझने के लिए 2024 में हुए लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को भी देखते हैं। जंगीपुर जैसी सीटों पर जहां 55 फीसदी मुस्लिम आबादी है, वहां लोकसभा चुनाव में भाजपा को 73 हजार वोट मिले, जो यह बताते हैं कि अल्पसंख्यक वोटों के बिखराव का सीधा फायदा भाजपा को मिल रहा है। इसके मुकाबले तृणमूल कांग्रेस को 70 हजार वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस ने 54 हजार वोट पाए थे।





 

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