
- बेंगलुरु में हर रोज 100 करोड़ खर्च, फिर भी आम समस्याएं बनीं.
- वित्त वर्ष 2021-22 में शहर पर 38,455 करोड़ रुपये हुए खर्च.
- विभिन्न एजेंसियां खर्च करती हैं, फिर भी पारदर्शिता का अभाव.
- एजेंसियों में समन्वय और जवाबदेही की कमी सुधार में बाधा.
देश की आईटी राधानी के नाम से मशहूर बेंगलुरु, दूर से तो हमें विकासशील दिखता है. लेकिन आए दिन ये राजधानी सड़क में गड्ढे, ट्रैफिक जाम, जल भराव जैसी चीजों के लिए सुर्खियों में बना रहता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर यहां विकास हो भी रहा है या नहीं? हाल ही में इस शहर को लेकर चल रही खबरों को सुनकर तो आप और भी ज्यादा सोच में पड़ जाएंगे. क्योंकि खबरों की मानें तो इस शहर पर हर रोज 100 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन ये पैसा जा कहां रहा है?
100 करोड़ होते हैं हर रोज खर्च
हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया ने जानााग्रह नाम की संस्था की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि, वित्त वर्ष 2021-22 में शहर पर कुल 38,455 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. इस रकम का औसत निकाला जाए तो वो 100 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है. राज्य सरकार और कई सारी पब्लिक एजेंसियां मिलकर ये खर्च कर रही हैं. जब सड़कों के गड्ढे जस के तस हैं, जलभराव हर बारिश में हो जाता है और ट्रैफिक जाम लगातार बढ़ता ही जा रहा है, तो ऐसे में सवाल यही उठता है कि ये पैसा आखिर जा कहां रहा है?
कौन देखा है बेंगलुरु का खर्च?
बेंगलुरु के कुल खर्च का लगभग 20% हिस्सा ही नगर निगम उठाता है. बाकी का 80% खर्च बेंगलुरु इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी, बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवेज बोर्ड और बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन जैसी कई एजेंसियां नियंत्रित करती हैं. ये सभी एजेंसियां महत्वपूर्ण सुविधाएं जैसे बिजली, ट्रांसपोर्ट और पानी संभालती हैं, लेकिन इन सभी सर्विसेज में कोई ना कोई खोट है, ऐसे में जनता का सवाल करना भी जायज है.
हालातों में क्यों नहीं आता सुधार?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े खर्च के बावजूद शहर के हालतों में सुधार क्यों नहीं नजर आता है? एक्सपर्ट्स की मानें तो इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं:
- सबसे पहले तो ये पैसा अलग- अलग एजेंसियों में बिखरा हुआ है, जिसकी वजह से ये सिटमैटिक तरीके से खर्च नहीं किया जाता है. इस पैसे को खर्च करने के लिए एक केंद्रीकृत सिस्टम होना चाहिए, जो पूरे खर्च का हिसाब देखे.
- कई एजेंसियां हैं जो अपने खर्च का ब्योरा नहीं देती हैं, अपने डाटा को सार्वजनिक नहीं करतीं जिससे सिस्टम में पारदर्शिता की कमी नजर आती है.
- एजेंसियों की तरफ से कोई जवाबदेही या जिम्मेदारी जैसी चीज नहीं है, जिसकी वजह से व्यवस्था कमजोर नजर आती है.
इन्हीं समस्याओं की वजह से हालात ऐसे बने हुए हैं कि हर रोज 100 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी आम जन समस्याओं से घिरा हुआ है. लोगों को घंटों ट्रैफिक में फंसे रहना पड़ता है, गड्ढों की वजह से एक्सिडेंट होते हैं, बिजली की आपूर्ति नहीं होती, पानी की किल्लत रहती है. ऐसे में जनता का आक्रोश भी सही है.
